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श्री वैष्णो देवी की आरती

Jan 5
2 min read

जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता।हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता॥

शीश पे छत्र विराजे, मूरतिया प्यारी।गंगा बहती चरनन, ज्योति जगे न्यारी॥

ब्रह्मा वेद पढ़े नित द्वारे, शंकर ध्यान धरे।सेवक चंवर डुलावत, नारद नृत्य करे॥

सुन्दर गुफा तुम्हारी, मन को अति भावे।बार-बार देखन को, ऐ माँ मन चावे॥

भवन पे झण्डे झूलें, घंटा ध्वनि बाजे।ऊँचा पर्वत तेरा, माता प्रिय लागे॥

पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट पुष्प मेवा।दास खड़े चरणों में, दर्शन दो देवा॥

जो जन निश्चय करके, द्वार तेरे आवे।उसकी इच्छा पूरण, माता हो जावे॥

इतनी स्तुति निश-दिन, जो नर भी गावे।कहते सेवक ध्यानू, सुख सम्पत्ति पावे॥


– श्रद्धा, संकल्प और माता की कृपा

जब भक्त कठिन रास्तों, थकान और परीक्षाओं को पार करता हुआ माता के दरबार तक पहुँचता है, तब श्री वैष्णो देवी की आरती उसके मन को अपार शांति और संतोष से भर देती है। यह आरती केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस यात्रा की पूर्णता है जो श्रद्धा और विश्वास से शुरू होती है।

त्रिकुटा पर्वत पर विराजमान माता वैष्णो देवी शक्ति, करुणा और संरक्षण का दिव्य स्वरूप हैं। आरती के समय जलता हुआ दीप यह प्रतीक बन जाता है कि चाहे मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो, माता की कृपा से हर अंधकार दूर हो जाता है।

श्री वैष्णो देवी की आरती हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में धैर्य, अनुशासन और अटूट विश्वास आवश्यक है। माता अपने भक्तों को वही देती हैं, जो उनके जीवन के लिए सबसे उत्तम होता है।

जो श्रद्धा और संकल्प के साथ श्री वैष्णो देवी की आरती करता है, उसके जीवन में भय, निराशा और अस्थिरता स्वयं दूर होने लगती है।जहाँ माता वैष्णो का नाम है,वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है।यही श्री वैष्णो देवी की आरती की सच्ची महिमा है।

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