श्री हरि विष्णु जी की आरती
- mohit goswami
- Jan 4
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श्री हरि विष्णु जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे
जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥ ॐ जय जगदीश हरे
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती॥ ॐ जय जगदीश हरे
दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पडा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे

श्री हरि विष्णु जी की आरती – मन को शांति देने वाला अनुभव
जब भी जीवन में अशांति, डर या भ्रम का भाव आता है, तब श्री हरि विष्णु जी की आरती मन को अद्भुत शांति प्रदान करती है। आरती की हर पंक्ति में भरोसा है, हर दीप की लौ में आशा झलकती है।
श्री विष्णु जी को सृष्टि का पालनकर्ता कहा गया है। उनकी आरती करते समय ऐसा महसूस होता है मानो सारी चिंताएँ धीरे-धीरे दूर हो रही हों और मन किसी गहरे सागर की तरह स्थिर हो गया हो। शंख की ध्वनि, घंटियों की आवाज़ और “ॐ नमो नारायणाय” का स्मरण आत्मा को भीतर से पवित्र कर देता है।
यह आरती सिर्फ़ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का संवाद है — जहाँ भक्त अपने सारे दुःख, डर और इच्छाएँ प्रभु के चरणों में अर्पित कर देता है। कहते हैं जो व्यक्ति श्रद्धा से श्री हरि विष्णु जी की आरती करता है, उसके जीवन में संतुलन, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
हरि की भक्ति हमें सिखाती है कि जीवन चाहे जैसा भी हो, धर्म और सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।नारायण का नाम लेते ही मन खुद-ब-खुद शांत हो जाता है…यही तो श्री हरि विष्णु जी की आरती का सच्चा प्रभाव है।



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