श्री शिव जी की आरती
- mohit goswami
- Jan 4
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कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं ।
सदा वसन्तं ह्रदयाविन्दे भंव भवानी सहितं नमामि ॥
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा ।
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे ।
हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें ।
तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी ।
चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें
सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें
ॐ जय शिव ओंकारा......
कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता ।
जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी ।
नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें ।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें ॥
ॐ जय शिव ओंकारा.....
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा।
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा......

श्री शिव – शून्य में बसे अनंत
श्री शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था हैं जहाँ आरंभ और अंत का भेद मिट जाता है। वे संहारक कहलाते हैं, लेकिन उनका संहार विनाश नहीं — नव सृजन का द्वार है।
कैलाश में विराजमान शिव सरल हैं, निर्विकार हैं। भस्म उनका श्रृंगार है, क्योंकि वे हमें सिखाते हैं कि अंततः सब नश्वर है। गले में नाग, जटाओं में गंगा और मस्तक पर चंद्रमा — हर प्रतीक जीवन के गहरे सत्य को प्रकट करता है।
शिव ध्यान हैं, शिव मौन हैं, और शिव ही वह शक्ति हैं जो सबसे बड़े तूफान में भी स्थिर रहती है। वे न मांगते हैं, न दिखावा चाहते हैं — बस सच्चा भाव और निर्मल मन स्वीकार करते हैं। इसलिए तो उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है।
श्री शिव का स्मरण हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन कैसे रखा जाए — न अति भोग, न पूर्ण त्याग। वे गृहस्थ भी हैं और योगी भी, करुणामय भी हैं और रौद्र भी।
जहाँ अहंकार समाप्त होता है,वहीं शिव का वास होता है।शिव सत्य हैं, शिव शांति हैं,और शिव ही स्वयं चेतना हैं।



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