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श्री राधा जी की आरती


आरती श्री वृषभानुसुता की ।


मंजु मूर्ति मोहन ममताकी ।। टेक ।।



त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,


विमल विवेकविराग विकासिनि ।


पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,


सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ।।


मुनि मन मोहन मोहन मोहनि,


मधुर मनोहर मूरती सोहनि ।


अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि,


प्रिय अति सदा सखी ललिताकी ।।


संतत सेव्य सत मुनि जनकी,


आकर अमित दिव्यगुन गनकी,


आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,


अति अमूल्य सम्पति समता की ।।


कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि,


चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।


जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि,


आदि अनादिशक्ति विभुताकी ।।


प्रेम, समर्पण और आत्मा का मिलन

जब भक्ति में प्रेम घुल जाए और प्रेम ही साधना बन जाए, तब श्री राधा जी की आरती हृदय को वृंदावन की दिव्य अनुभूति से भर देती है। राधा जी केवल कृष्ण की प्रेयसी नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम और परम भक्ति का साकार रूप हैं।

आरती के समय जलता हुआ दीप राधा के उस उज्ज्वल प्रेम का प्रतीक बन जाता है, जो किसी अपेक्षा या स्वार्थ से बंधा नहीं है। उनका स्मरण हमें यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं माँगता, वह स्वयं को अर्पित कर देता है।

श्री राधा जी की आरती हमें बताती है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम और समर्पण है। जहाँ ज्ञान मौन हो जाता है, वहाँ राधा का भाव बोलने लगता है। वे भक्ति की वह ऊँचाई हैं, जहाँ आत्मा और परमात्मा का भेद मिट जाता है।

जो श्रद्धा और प्रेम से श्री राधा जी की आरती करता है, उसके जीवन में मधुरता, करुणा और आध्यात्मिक आनंद का संचार होता है।जहाँ राधा का नाम है,वहाँ कृष्ण स्वयं उपस्थित होते हैं।यही श्री राधा जी की आरती की दिव्य महिमा है।

 
 
 

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