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श्री मायातीत विष्णु जी की आरती

श्री मायातीत विष्णु जी की आरती


जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।


मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥ जय जगदीश हरे



आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।


अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥ जय जगदीश हरे



अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।


सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥ जय जगदीश हरे



विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।


विश्व चराचर तुम ही, तुम ही विश्वभूपा॥ जय जगदीश हरे



माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद्-भर्ता।


विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥ जय जगदीश हरे



साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।


केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥ जय जगदीश हरे



राम-कृष्ण करुणामय, प्रेमामृत-सागर।


मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥ जय जगदीश हरे



सब विधि-हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।


प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन मन॥ जय जगदीश हरे



आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।


पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥ जय जगदीश हरे



श्री मायातीत विष्णु जी की आरती – माया से परे ईश्वर का स्मरण

जब मन संसार की माया, भ्रम और उलझनों में उलझ जाता है, तब श्री मायातीत विष्णु जी की आरती हमें उस सत्य की याद दिलाती है जो हर बंधन से परे है। “मायातीत” — यानी जो माया से ऊपर हैं, जिन पर न समय का प्रभाव है और न ही संसार का मोह।

इस आरती का प्रत्येक शब्द आत्मा को भीतर तक छूता है। ऐसा लगता है जैसे प्रभु विष्णु हमें समझा रहे हों कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और मोह-ममता सब क्षणिक हैं। जो शाश्वत है, वही नारायण हैं। दीप की लौ के साथ जब मन झुकता है, तो अहंकार अपने आप शांत हो जाता है।

श्री मायातीत विष्णु जी की आरती सिर्फ़ स्तुति नहीं, बल्कि आत्मबोध का मार्ग है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में रहते हुए भी माया से बंधे बिना कैसे जिया जाए — कर्तव्य निभाते हुए, लेकिन आसक्ति से मुक्त होकर।

जो भक्त श्रद्धा और एकाग्रता से यह आरती करता है, उसके भीतर वैराग्य, शांति और संतुलन स्वतः जन्म लेते हैं।नारायण का स्मरण हमें याद दिलाता है किसंसार बदलता है, पर सत्य अटल रहता है।यही श्री मायातीत विष्णु जी की आरती का दिव्य सार है।

 
 
 

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