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श्री बृहस्पति देव की आरती

जय बृहस्पति देवा, ऊँ जय बृहस्पति देवा ।


छि छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥


तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।


जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥


चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता ।


सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥


तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े ।


प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ॥


दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।


पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥


सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो ।


विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥


जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहत गावे ।


जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥



श्री बृहस्पति देव की आरती – ज्ञान, विवेक और शुभता का आशीर्वाद

जब जीवन में सही मार्गदर्शन और सद्बुद्धि की आवश्यकता होती है, तब श्री बृहस्पति देव की आरती मन को शांति और स्पष्टता प्रदान करती है। देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, धर्म और नीति के प्रतीक हैं, जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

आरती के समय प्रज्वलित दीप यह संकेत देता है कि ज्ञान ही वह शक्ति है जो भ्रम, अहंकार और नकारात्मकता को दूर कर सकती है। बृहस्पति देव का स्मरण हमें संयम, सदाचार और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।

श्री बृहस्पति देव की आरती केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग है। यह हमें सिखाती है कि सफलता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ धर्म और करुणा जुड़े हों। गुरु का आशीर्वाद जीवन को संतुलित और शुभ बनाता है।

जो श्रद्धा और विश्वास से श्री बृहस्पति देव की आरती करता है, उसके जीवन में ज्ञान, सम्मान और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।जहाँ गुरु की कृपा होती है,वहाँ अंधकार नहीं टिकता।यही श्री बृहस्पति देव की आरती की दिव्य महिमा है।

 
 
 

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