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श्री गंगा जी की आरती


ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।

जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥

ॐ जय गंगे माता॥


चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।

शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥

ॐ जय गंगे माता॥


पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।

कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥

ॐ जय गंगे माता॥


एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।

यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥

ॐ जय गंगे माता॥


आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।

सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥

ॐ जय गंगे माता



पवित्रता, प्रवाह और मोक्ष की अनुभूति

जब जीवन में बोझ, पापबोध या थकान महसूस हो, तब श्री गंगा जी की आरती आत्मा को अद्भुत शांति और शुद्धता का अनुभव कराती है। माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करुणा, क्षमा और जीवन के निरंतर प्रवाह की सजीव प्रतीक हैं।

आरती के समय लहरों पर तैरते दीप ऐसे लगते हैं मानो हर चिंता, हर पीड़ा बहकर दूर जा रही हो। गंगा जी का स्मरण हमें यह सिखाता है कि जैसे नदी सब कुछ स्वीकार कर आगे बढ़ती है, वैसे ही जीवन में भी शुद्ध भाव के साथ निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।

श्री गंगा जी की आरती हमें यह एहसास कराती है कि पवित्रता केवल जल में नहीं, बल्कि विचार और कर्म की निर्मलता में होती है। माँ गंगा सबको समान रूप से अपनाती हैं — बिना भेद, बिना शर्त।

जो श्रद्धा और विश्वास से श्री गंगा जी की आरती करता है, उसके मन से ग्लानि दूर होती है और भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है।जहाँ गंगा का प्रवाह है,वहाँ जीवन स्वयं पवित्र हो जाता है।यही श्री गंगा जी की आरती की दिव्य महिमा है।

 
 
 

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